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शपथग्रहण के साथ ही ग्रहण …
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शपथग्रहण के साथ ही ग्रहण …

धीरेंद्र कुमार
आज तक हम सुनते आए हैं ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है’?…. 30 मई को जब पूरा देश नरेंद्र मोदी की दूसरी ताजपोशी का जश्न मना रहा था तब, बिहार की राजनीति का चाणक्य नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के आंगन में ताल ठोक कर इसी गीत को नये अंदाज में गाया…पहली बार बोला गया ‘तेरे अंगने में मेरा क्या काम है’… दरअसल संसद की सीढ़ी पर जब कोई शख्सियत अपने बुते 303 सांसदो की सुरक्षा कवच के आसरे चढ़ रहा हो, तब उसके घर में घुसकर यह कहना कि, हम तेरी शर्तो पर तेरे महल में नहीं रह सकते.. ऐसा माद्दा नीतीश जैसे बिरले के पास ही हो सकता है…… फिलहाल इतना तो दावा के साथ कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की दूसरी ताजपोशी के मौके पर नीतीश कुमार पूरे देश में यह संदेश देने में कामयाब रहे कि शेर के दांत गिनने की ताकत आज भी उन्हीं के पास है…
अब जरा अतीत के झरोखे से बिहार की राजनीति को समझते हुए हम वर्तमान की राजनीति के चौखट पर आएंगे और पूरे आलेख में इस बात को समझने की कोशिश करेंगे की बिहार की भविष्य की राजनीति आखिर किस ओर जा सकती है…
बात शुरू होती है साल 2010 से…बिहार विधानसभा का चुनाव एनडीए तब के दोनों दल, भाजपा और जदयू एक साथ थे…नरेंद्र मोदी हिन्दू ह्रदय सम्राट के तौर पर पहचान बना चुके थे और बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर पर इनकी पहचान स्टार कैंपेनर की बन चुकी थी… बिहार में इनके सम्मान में नीतीश कुमार ने प्रदेश के सीएम की हैसियत से एक भोज का आयोजन किया था…लेकिन भोज के चंद घंटे पहले ही नीतीश कुमार ने इनकी छवि और खुद की छवि को देखते हुए भोज रद्द कर दिया… भाजपा ने अपमान का घूंट पी लिया..चुनाव के बाद बिहार में एनडीए की बहुमत वाली सरकार बनी.. केंद्रीय सत्ता में काबिज यूपीए बिहार में काएदे से विपक्ष दल की संवैधानिक हैसियत पाने से भी वंचित रह गई… लेकिन एनडीए के अंदर बात अब बिगड़ चुकी थी…इधर साल 2013 में जैसे ही भाजपा ने नरेंद्र दामोदर दास मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया…नीतीश कुमार ने बिना वक्त गंवाए भाजपा से अपना 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ लिया.. नीतीश को विरोधी लालू प्रसाद और कांग्रेस का साथ मिला, जद यू बीजेपी को चिढ़ाते हुए शासन करती रही…
2015 में बिहार विधानसभा के चुनाव में नीतीश-लालू-और कांग्रेस की तिकड़ी की आंधी में बीजेपी-रालोसपा-हम की तिकड़ी तिनके के माफिक उड़ गई…नीतीश कुमार अपने नये गठबंधन के नेता भी बने और तकरीबन 180 विधायकों के साथ सदन के अंदर तीसरी-चौथी बार मुख्यमंत्री की हैसियत से प्रवेश भी किया… इस चुनाव में नरेंद्र मोदी की छवि एनडीए की काम ना आई… बिहार की जनता ने नीतीश के नेतृत्व, लालू प्रसाद का सामाजिक समिकरण और कांग्रेस की शासकीय योग्यता पर अपना मुहर लगा दिया… अचानक नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के खिलाफ सबसे बड़े और विश्वनीय चेहरा के तौर पर उभरे..

2014 लोकसभा चुनाव बिहार परिणाम एक नजर में
PARTY
SEATS
%

BJP
22
29.40

LJP
06
6.40

RLSP
03
3.00

RJD
04
20.10

CONG

02
8.40

NCP
01
1.20

JDU
02
15.80

2015 बिहार विधानसभा चुनाव एक नजर में
Party
JDU
%
29.21

RLSP
0.82

HAM
0.41

CONG
11.11

RJD
39.92

CPI ml
1.23

BJP
21.81

LJP
0.82

अब आ जाइए आज पर …आज की कहानी शुरू होती है..2017 से…कथित तौर पर नीतीश कुमार को 2017 में ही इस बात का अहसास हुआ कि लालू प्रसाद भ्रष्ट आदमी हैं और इनके परिवार के पास जो भी धन है वो पुश्तैनी ना होकर सरकार के संरक्षण में भ्रष्टाचार के चादर पर अनैतिक योगासन से कमाया हुआ धन है… तकनीकी रूप से नीतीश कुमार अभी तक राजनीति की काजल कोठरी में बेदाग रहे हैं…लिहाजा राजनीति में दाग पहचानने की इनकी काबिलियत काबिले तारीफ है… अचानक 2017 में लालू जी का दाग इनको कुछ अधिक गहरा जान पड़ा.. परिणाम लालू से दोस्ती को दो साल के अंदर ही तोड़ दिया और उसी नरेंद्र मोदी की गोदी में जा बैठे.. जिनकी सांप्रदायिक छाया से भी बचने के लिए भ्रष्ट लालू की छतरी में जा बैठे थे… लालू 80 विधायक के साथ बिलबिलाते रहे..कांग्रेस हाथ मलते रह गई और कुछेक घंटो के रोमांच में नीतीश ने सीएम की कुर्सी को छोड़ फिर पकड़ लिया…सबका साथा सबका विकास- केंद्र राज्य साथ साथ के मंत्र के साथ प्रदेश की सरकार में चार साल के अंतराल के बाद पुण: भाजपा शामिल हुई थी…राजनीति का किरदार बदल चुका था लेकिन राजनीति के गीत वही पुराने थे…..नीतीश पुरानी कुर्सी पर नये तेवर के साथ बैठे थे…हर तरफ नव कंज लोचन कर कंज मुख जैसा वातावरण हो गया…
इधर भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में लगातार भारत विजय करते जा रही थी…नीतीश उपर से खुश और अंदर से भयभीत होते थे लेकिन डर के आगे जीत है जैसे जुमलों के सहारे साहस बटोरते और विकास का हांव-हांव समयानुसार करते रहते… 2019 लोकसभा चुनाव की बेला आई…02 सांसद की हैसियत वाली नीतीश कुमार की पार्टी को भाजपा ने अपनी जीती हुई पांच सीट गिफ्ट कर बराबरी का दर्जा दिया… अब नीतीश खुद को नरेंद्र मोदी के कुछ अधिक ‘भीरू’ महसूस कर रहे थे…इस चुनाव में नीतीश ने भी भाजपा के साथ मिल कुछ नये सामाजिक राजनीतिक प्रयोग किये…सफल रहे…बिहार में भाजपा वाले सोच रहे थे कि सब नमो मंत्र का प्रभाव है और जद यू वाले के लिए बिहारी राजनीति के चाणक्य नीतीश कुमार का प्रभाव…वास्तव में कुछ प्रभाव था या कोई करामात इस पर अभी शोध हो नहीं पाया है…लेकिन नीतीश इस समय भी अपनी सेकुलर छवि को बचाने की जद्दोजेहद में थे… मंच पर प्रधानमंत्री के साथ रहते हुए भी..पीएम के आह्वाण पर ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ मंत्र का उदबोधन नहीं किया… चुनाव के दिन भी अलापते रहे कि धारा 370, राम मंदिर और काश्मीर का 35A जैसे विषय पर हम भाजपा के साथ नहीं हैं… मतगणना के दिन बिहार की राजनीति के हिसाब से उत्तर प्रदेश में एक अप्रत्याशित घटना हुई… कर्मठ योग्य मंत्री मनोज सिन्हा गाजीपुर से भाजपा की टिकट पर चुनाव हार गये… इनकी जाति की भावना को समझते हुए नीतीश कुमार ने दूसरे दल के इस समर्पित कार्यकर्ता को बिहार से राज्यसभा में भेजने का ऐलान कर दिया…नीतीश ने इस मुद्दे पर भाजपा की भावना की परवाह नहीं की…शायद भाजपा को बुरा लगा हो…शायद भाजपा को बुरा लगना चाहिए…
इधर मंत्रिमंडल की शपथ पर माथापच्ची होने लगी…देश भर में नरेंद्र मोदी अपने बुते 303 सीट लाकर दूसरी बार सरकार बनाने को प्रस्तुत हुए… सहयोगी पार्टी पर भी रहम करते हुए अपने मंत्रिमंडल में सहयोगी को एक कैबिनेट सीट देना स्वीकार किया… बस यहीं पर बात बनते बनते रह गई… शपथग्रहण के दौरान ही ग्रहण लग गया… नीतीश कुमार ने शपथग्रहण समारोह के ठीक पहले ऐलान कर दिया कि हमारी पार्टी किसी भी सूरत में सांकेतिक रूप से सत्ता में शामिल नहीं होगी… अगर केंद्रीय मंत्रीमंडल में दगह देना ही है तो संख्या बल के हिसाब से दो.. नहीं तो रखो अपनी धरती तमाम…
बिहार: जातिगत आंकड़ा 2011 की जनगणना के हिसाब से
O
B
C
Yadav
14%

Kurmi
4%

Kushwaha
8%

EBC (Mallah 6% &
Teli 3%
26%

S
C
Chamar
6%

Dusadh
5%

Mushar
2.8%

Other
3%

G
E
N

Bhumihar
6%

Brahmin
5%

Rajput
3%

Kayastha
1%

ST
1.3%

Mino
rity
Muslim
12.5%

Others
2%

जातिगत जनगणना का स्रोत
(https://en.wikipedia.org/Bihar_Legislative_Assembly_election,_2015)
सारा खेल उपर वर्णित जाति की गिनती पर ही टिका है…राजनीति का यह कटु सत्य कि, जाति के आधार पर ही राजनीतिक पार्टियां टिकट आवंटित करती है…कुछ लोग कह रहे हैं कि 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान जाति की दीवार धवस्त हो गई…दरअसल वे इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि ध्वस्त होने के बाद वहां समतल जमीन का निर्माण नहीं हुआ है बल्कि मैदान पहले से अधिक खुरदरी हुई है… वस्तुत: पुरानी दीवार को गिरा कर एक नई दीवार को खड़ा करने का एनडीए द्वारा एक सफल प्रयास किया गया है… आज तक बीजेपी सवर्ण आधारित राजनीति करती थी लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में खुल कर इसबार पिछड़ा और दलित राजनीति करने की कोशिश हुई और सवर्णों को इनके लिए मार्ग प्रशस्त करने को कहा गया और ऐसा ही हुआ भी….
नीतीश कुमार के लिए चिंता का विषय यही है…दरअसल नीतीश पीछले 15 साल से बिहार में इसी राजनीतिक प्रयोग के आसरे खुद 04 फीसदी वोटबैंक के मालिक होते हुए भी सत्ता पर काबिज हैं और लालू को शासन से बाहर रखे हुए हैं…अब सुशासन बाबू की पेशानी पर बल पड़ा है… वजह केंद्र की राजनीतिक तैयारी के अनुसार सुशासन बाबू अब अपनी राजनीति की अंतिम पारी खेल रहे हैं….
लेकिन मेरे एक पत्रकार मित्र (शशि भूषण) का कहना है कि नीतीश की नाभी में क्या है इसका अंदाजा अंतिम समय तक किसी को नहीं होता…नीतीश अपने पत्ते को अंतिन दम तक छुपा कर रखते हैं और इनको बखूबी पता होता है कि कब किस पत्ते को बाहर करना है…लेकिन इस बार पाला उनसे पड़ा है जो अपने सारे पत्ते खोल कर खेलता है और इनका तुरूप का पत्ता कोई इक्का नहीं राजनीतिक इमोशनल कार्ड होता है… गौर से समझिए…अनुभवी राधा मोहन सिंह को केंद्रीय मंत्री मंडल में जगह नहीं दिया गया…लालू के हनुमान राम कृपाल यादव को भी केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह नहीं दिया गया…राजीव प्रताप रूढ़ी भी बाहर हैं…बिहार में भाजपा शीघ्र ही नेतृत्व परिवर्तन करेगी… नीतीश लालू से इतनी दूर चले गये हैं कि इनके पास अब दो ही समिकरण साधने को बच गया है..
भाजपा की धुन पर जबतक पूरी तरह से बेइज्जत न हो जाएं तबतक ता-ता थैया करते रहें ..
कांग्रेस-हम-रालोसपा-माले-जदयू के साथ एक समिकरण गढ़ने में कामयाब हों और बिहार के त्रीकोणिय चुनाव में अपने लिए रास्ता बनाएं..
आगे होगा क्या फिलहाल स्पष्ट रूप से कहना जल्दबादी होगी…लेकिन कुछ न कुछ होगा जरूर…क्योंकि नीतीश की नाभी में क्या है इसके बारे में कार्य होने के बाद ही लोगों को पता चल पाता है…