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पहले दिन से प्रचार खत्म होने तक गिरिराज ने बदला बेगूसराय का गणित
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पहले दिन से प्रचार खत्म होने तक गिरिराज ने बदला बेगूसराय का गणित
गिरिराज ने अपने प्रचार के तरीके में अपनी पुरानी आक्रामकता कायम रखते हुए अपने विरोधियों को दो खेमों में बाट दिया.

बेगूसराय चुनाव लड़ने जाने से पहले ना नुकुर करने वाले गिरीराज सिंह ने चुनाव प्रचार खत्म होने तक बेगूसराय का गणित बदल दिया है. गिरिराज ने अपने प्रचार के तरीके में अपनी पुरानी आक्रामकता कायम रखते हुए अपने विरोधियों को दो खेमों में बाट दिया. साथ ही अपने आप को विरोधियों से ज्यादा स्थानीय साबित करने की कोशिश की. गिरिराज सिंह पर दोनों मुख्य दलों का सबसे बड़ा आरोप बाहरी होने का था, लेकिन यह आरोप धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है. इसके पीछे कारण है दोनों विरोधियों के प्रचार करने का तरीका.
दरअसल, गिरिराज को बाहरी बताकर चुनाव प्रचार की शुरुआत करने वाले कन्हैया के लिए प्रचार करने वाले लोगों में ज्यादातर बाहरी लोग ही दिख रहे हैं. इनमें फिल्म इंडस्ट्री से लेकर सामाजिक संगठनों तक के लोग शामिल हैं, जो कन्हैया के प्रचार के लिए बेगूसराय पहुंच रहे हैं. साथ ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का एक बड़ा दल कन्हैया के प्रचार के लिए बेगूसराय में कैंप कर रहा है. एक अखबार में छपी रिपोर्ट के अनुसार कन्हैया के जेएनयू कार्ड के जबाब में आरजेडी के उम्मीदवार तनवीर हसन ने भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जेएनयू से छात्रों का एक दल बुलाया है.
वहीं, इसके इतर गिरीराज सिंह के साथ सिर्फ पार्टी कैडर और आस-पास के इलाके के लोग हैं. ऐसे में स्थानीय लोगो में ये साफ-साफ संदेश जा रहा है कि जिन लोगों को अपने प्रचार के लिए स्थानीय लोगों पर भरोसा नहीं है.
इस पूरे प्रचार का एक दूसरा पहलू भी है. नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानी पत्रकार ने बताया कि दरअसल सांसद और आम लोगों के बीच की कड़ी होने वाला कार्यकर्ता इस चुनाव में कन्हैया कुमार के पास नहीं है. यही कार्यकर्ता चुनाव के बाद भी लोगों की शिकायते सुनता है, क्योंकि सांसद का ज्यादातर समय तो दिल्ली में निकल जाता है.

उन्होंने कहा कि कन्हैया कुमार कुछ महीने पहले ही चुनाव के लिए बेगूसराय आए हैं और यहां पर उनकी पार्टी का कैडर भी नहीं है. पिछले चुनाव में जिस 1 लाख 72 हजार वोट का दावा किया जा रहा है, दरअसल वो सीपीआई और जेडीयू के गठबंधने को मिला था न कि सिर्फ सीपीआई को. ऐसे में ये अंदाजा लागाना मुश्किल नहीं होगा कि इस वोट में बड़ा हिस्सा किसका है. कन्हैया यहीं अंदाजा लगाने में मात खा गए.