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डॉ कल्याणी कबीर की कविता
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ये भी सच है कि कविताएँ रोटी नहीं देती

माना कि
कविता जीने का आधार नहीं है
हर किसी को मिल जाए वो पुरस्कार नहीं है ,
ये भी सच है कि कविताएँ रोटी नहीं देती ,
जहाँ बैठ सुस्ताए मन
वो ऊँची चोटी नहीं देती ,
पर इतना जरूर करती है
कि , एक ताप ज़िंदा रहे,
संघर्ष के समंदर में भी
आलाप ज़िंदा रहे !!
— Kalyani Kabir