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Oct,17,2020 01:26:49

सरकारी अनाज की कालाबाजारी की जांच हो तो बड़े बड़ों की फस सकती है गर्दन
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*सरकारी अनाज की कालाबाजारी की जांच हो तो बड़े बड़ों की फस सकती है गर्दन*
*सत्ता और विपक्ष दोनों लोगों को मिलते हैं भारी भरकम चंदे*
शहर में सरकारी अनाज की कालाबाजारी का काम संगठित गैंग करता है. अभी तो छोटे-छोटे गुर्गे पकड़े गए हैं .अगर इसकी अच्छी तरह जांच कराई जाए तो कई सफेद लोगों की इसमें गर्दन फंस सकती हैं . यहां तक की सत्ता और विपक्ष से जुड़े लोगों का ऐसे अपराधियों को संरक्षण प्राप्त है. कहा तो यह भी जाता है कि प्रशासन और पुलिस के लोगों को भी इस बारे में अच्छी जानकारी है , लेकिन वैसे लोगों पर हाथ डालने के लिए जुर्रत जुटानी होगी. बताया जाता है कि पिछले दिनों सरकारी अनाज की कालाबाजारी के आरोप में गिरफ्तार किए गए संजय मोहनानी और दीपक मोहनानी तो मोहरे हैं. उनकी सांठगांठ ऊंचे ओहदे वालों से है. संजय और दीपक मोहनानी जैसे लोग समय-समय पर इन लोगों को भारी भरकम चंदा दिया करते हैं. विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों को इसका लाभ मिलता है. शहर में इस बात की गंभीर चर्चा है कि अगर जिला प्रशासन ने इसकी अच्छी तरह जांच कराई तो कई बड़े-बड़े लोगों की गर्दन फंसेगी, और उन्हें जेल जाना होगा. उल्लेखनीय है कि 18 सितंबर को डीसी के आदेश पर साकची मूसा सिंह बागान और गोलमुरी रिफ्यूजी मार्केट स्थित दुकानों में छापेमारी कर 50 लाख रुपए से अधिक के सरकारी अनाज की कालाबाजारी का खुलासा हुआ था. शुक्रवार को सिटी डीएसपी अनुदीप सिंह ने संजय मोहनानी और दीपक मोहनानी की गिरफ्तारी और उनकी कालाबाजारी की करतूतों की पूरी जानकारी प्रेस को दी थी. उन्होंने बताया था कि छापेमारी की जानकारी मिलते ही दोनों भाई भाग गए थे . जयपुर से वे रांची गए थे. फिर हजारीबाग और हजारीबाग से बिहार फिर बंगाल गए और गला फंसता हुआ जान कर वापस जमशेदपुर आ रहे थे, तभी सूचना के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था . उनकी कार और मोबाइल पुलिस ने जप्त की थी. पूछताछ में दोनों ने इस बात का खुलासा किया की कालाबाजारी के अनाज में एमओ, एजीएम से लेकर डोर स्टेप डिलीवरी ठेकेदार को भी हिस्सा मिलता था. एमओ को प्रति बोरा अनाज पर एक सौ रुपये और प्रति कार्ड पर ₹5 मिलते थे. दरअसल एमओ को हर दुकान का सत्यापन कर स्टॉक पंजी की जांच करनी होती है, पर वह ऐसा नहीं करते और बदले में रिश्वत पकड़ते हैं. जिले में एमओ की भारी कमी है . एक एम ओ के पास चार-चार, पांच-पांच क्षेत्र का प्रभार होता है. ऐसे में ये लोग जमकर मनमानी करते हैं, और सरकारी अनाज की कालाबाजारी से धन संग्रह किए जाते हैं . इसके अलावा डोर स्टेप डिलीवरी ठेकेदार और पीडीएस दुकानदार की भी इसमें संलिप्तता है. एजीएम को ₹50 प्रति बोरा के हिसाब से मिलता था. पीडीएस डीलरों को फ्री में मिलने वाले खाद्य सामग्री का प्रति क्विंटल 15 से 16 सौ रुपये मिलते थे . मजे की बात यह रही की डोर स्टेप डिलीवरी ठेकेदार अनिल सिंह की अभी गिरफ्तारी भी नहीं हुई थी कि उसने कोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली. यह बताने के लिए काफी है कि उन लोगों की पहुंच और पैरवी कहां तक है . कहते तो यह भी है कि अनिल सिंह को फिर से ठेका दिलवाने की कोशिश से राजनीतिक स्तर पर शुरू हो गई है, और इसके लिए लॉबिंग की जा रही है.

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